पाकिस्तान में 2030 तक जलवायु वित्तपोषण में 348 अरब डॉलर की कमी का अनुमान: प्रधानमंत्री के समन्वयक

पाकिस्तान में 2030 तक जलवायु वित्तपोषण में 348 अरब डॉलर की कमी का अनुमान: प्रधानमंत्री के समन्वयक

इस्लामाबाद (नज़राना टाइम्स): पाकिस्तान में 2030 तक जलवायु संबंधी जरूरतों के लिए उपलब्ध वित्तपोषण में 348 अरब डॉलर की कमी रहने का अनुमान है। वाणिज्य और उद्योग मामलों पर प्रधानमंत्री के समन्वयक राणा एहसान अफजल खान ने कहा कि जलवायु जोखिमों से निपटने में सक्षम अर्थव्यवस्था बनाने के लिए पाकिस्तान को रियायती वित्तपोषण, निजी निवेश और वैश्विक कार्बन बाजारों तक न्यायसंगत पहुंच की जरूरत है।

खान ने यह बात सस्टेनेबल डेवलपमेंट पॉलिसी इंस्टीट्यूट (एसडीपीआई) की ओर से आयोजित 29वें सतत विकास सम्मेलन के तीसरे दिन कही। पाकिस्तान में जलवायु वित्त के लिए राष्ट्रीय मंचों को सक्रिय करने की तैयारियों और कमियों पर आयोजित सत्र में उन्होंने कहा कि देश अब नीति बनाने से उसके क्रियान्वयन की ओर बढ़ रहा है। इसके लिए जलवायु समृद्धि योजना, पाकिस्तान ग्रीन टैक्सोनॉमी और विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने वाले एक राष्ट्रीय मंच पर काम किया जा रहा है। इस मंच का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त को देश की प्राथमिकताओं के अनुरूप इस्तेमाल करना है।

वित्त मंत्री के सलाहकार अदनान पाशा ने कहा कि जलवायु वित्त जुटाने के लिए संस्थागत ढांचा तैयार करने की अगुवाई वित्त प्रभाग करेगा। उन्होंने कहा कि पहल को चर्चा से आगे बढ़ाकर ठोस कार्ययोजना में बदलना होगा। जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि को देश के लिए गंभीर खतरे बताते हुए उन्होंने कहा कि वित्त प्रभाग संघीय मंत्रालयों और प्रांतीय सरकारों की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।

संकट प्रबंधन से निर्यात आधारित विकास की ओर बढ़ने पर जोर

एक अलग सत्र में राणा एहसान अफजल खान ने कहा कि पाकिस्तान को बार-बार आर्थिक संकटों से निपटने तक सीमित रहने के बजाय टिकाऊ, निर्यात आधारित विकास का रास्ता अपनाना चाहिए। उन्होंने आर्थिक नीतियों में बेहतर तालमेल, नीतिगत निरंतरता, संस्थागत सुधार और निजी क्षेत्र से अधिक निवेश की जरूरत बताई। प्रतिभागियों ने कहा कि व्यापक आर्थिक स्थिरता का लाभ औद्योगिक वृद्धि, रोजगार, अधिक निर्यात और बेहतर जीवन स्तर के रूप में दिखना चाहिए।

नेशनल असेंबली के सदस्य और वित्त, वाणिज्य तथा आर्थिक मामलों की स्थायी समिति के सदस्य मिर्जा इख्तियार बेग ने कहा कि पाकिस्तान ने अपनी राजकोषीय स्थिति मजबूत की है और कर्ज भुगतान में चूक का तात्कालिक खतरा टाला है। हालांकि, उनके अनुसार, इस स्थिरता से अब तक रोजगार, निर्यात वृद्धि या आम नागरिकों को अपेक्षित राहत नहीं मिली है। उन्होंने रंगों, रसायनों और पॉलिएस्टर फाइबर जैसे जरूरी आयातित कच्चे माल के लिए साख पत्रों (एलसी) पर पाबंदियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इन बाधाओं से निर्यातकों के लिए विदेशी ऑर्डर पूरे करना मुश्किल हो गया है।

योजना आयोग के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. मुहम्मद अली तालपुर ने कहा कि टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए राजनीतिक स्थिरता, नीतियों में निरंतरता और उनका प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है। उनके अनुसार, सरकार ने पंचवर्षीय योजना के तहत दीर्घकालीन आर्थिक रणनीति बनाई है। इसके साथ वार्षिक योजनाएं और मध्यावधि समीक्षा का प्रावधान है, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों के प्रदर्शन का आकलन कर जरूरत के मुताबिक नीतियों में बदलाव किया जा सके।

अर्थशास्त्री खाकान नजीब ने कहा कि सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों में कौशल और विशेषज्ञता की गंभीर कमी है। उनके अनुसार, कुछ पारिवारिक कारोबारों में स्वामित्व का ढांचा पेशेवर प्रबंधन, संस्थागत विकास और विस्तार को सीमित करता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान 79 वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के 25 कार्यक्रमों में शामिल हुआ और दशकों से बाहरी सहायता पर निर्भर रहा है। उन्होंने इस निर्भरता के पीछे की ढांचागत कमजोरियों को दूर करने पर जोर दिया।

उद्योग और निर्यात के लिए शुल्क, व्यापार और कर नीतियों में तालमेल की मांग

उद्योग और निर्यात के लिए शुल्क सुधारों पर आयोजित गोलमेज चर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि केवल आयात शुल्क में बदलाव से अर्थव्यवस्था का कायाकल्प नहीं होगा। इसके लिए औद्योगिक, व्यापार और कर सुधारों में तालमेल के साथ उत्पादकता और बुनियादी ढांचे में सुधार, ऊर्जा लागत में कमी, तकनीक तक बेहतर पहुंच और कारोबारी नियमों में स्थिरता जरूरी है।

इस्लामाबाद पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईपीआरआई) में आर्थिक सुरक्षा के अध्यक्ष डॉ. अनिल सलमान ने कहा कि सरकार अक्सर आर्थिक नीतियां अलग-अलग बनाती है। उन्होंने राष्ट्रीय शुल्क नीति को औद्योगिक और कर नीतियों के अनुरूप बनाने तथा तीन या पांच साल की तय समीक्षाओं का इंतजार करने के बजाय उसके असर की लगातार निगरानी करने की मांग की। उन्होंने कहा कि प्रगति का आकलन नए उद्योगों और निर्यातकों की संख्या, उत्पादकता में सुधार और वास्तविक निर्यात वृद्धि के आधार पर होना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के विशेषज्ञ डॉ. मंजूर ने कहा कि वैश्विक व्यापार के लिए अर्थव्यवस्था खोलने से पहले पाकिस्तान के पास निर्यात योग्य अधिशेष होना जरूरी नहीं है। वियतनाम का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि निवेश, व्यापार में खुलापन और आयातित कच्चे माल व अन्य उत्पादन सामग्री तक पहुंच से नए उद्योग और निर्यात क्षमता विकसित हो सकती है।

ब्रिटिश उच्चायोग के लुई डेन ने 2022 के एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि पाकिस्तान उन देशों में शामिल था, जहां व्यापार पर सबसे अधिक पाबंदियां थीं। उन्होंने इंग्लिश प्रीमियर लीग का उदाहरण देते हुए कहा कि विदेशी खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों की भागीदारी से वहां खेल का स्तर और प्रदर्शन बेहतर हुआ। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से पाकिस्तानी उद्योगों को नई तकनीक और विशेषज्ञता हासिल करने तथा अपनी प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

अर्थशास्त्री डॉ. कैसर बंगाली ने कहा कि पाकिस्तान के पास औद्योगिक बदलाव के लिए सुसंगत नीति का अभाव है। उनके अनुसार, सीमित निर्यात आधार और आयातित उत्पादन सामग्री पर निर्भरता ने औद्योगिक विकास को रोका है। मौजूदा प्रोत्साहन व्यवस्था में विनिर्माण की तुलना में रियल एस्टेट, शॉपिंग मॉल और अन्य गतिविधियों में अधिक मुनाफा मिलता है। उन्होंने उत्पादक निवेश, स्थानीय प्रसंस्करण और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने तथा सट्टेबाजी और निहित स्वार्थों को मिलने वाली तरजीह पर रोक लगाने की मांग की।

उद्योग और वाणिज्य मामलों के पूर्व संघीय सचिव सुलेमान गनी ने अलग उद्योग मंत्रालय की जरूरत पर सवाल उठाया। उन्होंने सुझाव दिया कि इसके काम वाणिज्य मंत्रालय को सौंपे जा सकते हैं, जबकि तकनीकी जिम्मेदारियां इंजीनियरिंग डेवलपमेंट बोर्ड जैसी विशेषज्ञ संस्थाएं संभाल सकती हैं। उन्होंने कहा कि निवेश और तकनीक आकर्षित करने के लिए कुशल श्रमिक, यथार्थपरक विनिमय दरें और तर्कसंगत शुल्क जरूरी हैं।

कोयले से स्वच्छ ऊर्जा की ओर चरणबद्ध बदलाव पर जोर

कोयले से स्वच्छ ऊर्जा की ओर न्यायसंगत बदलाव पर आयोजित नीति संवाद में ऊर्जा विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और विकास क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने कोयला आधारित बिजली से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर चरणबद्ध और वित्तीय रूप से व्यवहार्य बदलाव की मांग की। उन्होंने कहा कि बिजली संयंत्रों की क्षमता के लिए बढ़ते भुगतान, कोयला संयंत्रों का घटता उपयोग और सौर ऊर्जा का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल बिजली क्षेत्र की ढांचागत कमजोरियां उजागर कर रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन मामलों के पूर्व संघीय मंत्री मलिक अमीन असलम ने कहा कि पाकिस्तान के पास कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को बंद करने के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण के विकल्प हैं, लेकिन सुधार लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। उन्होंने कहा कि घरों और कारोबारों में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जबकि सरकारी नीतियां उस रफ्तार के साथ नहीं चल पाई हैं।

एशिया और प्रशांत के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (यूएनईएससीएपी) के माइकल विलियमसन ने कहा कि पाकिस्तान के ज्यादातर कोयला आधारित बिजली संयंत्र 2015 के बाद चालू हुए थे। उनसे जुड़ी बड़ी वित्तीय देनदारियां अभी बाकी हैं, जिससे ऊर्जा बदलाव अधिक जटिल हो जाता है।

नेशनल असेंबली के सदस्य रियाज फत्याना ने बिजली दरें घटाने, नवीकरणीय ऊर्जा पर करों की समीक्षा करने और वैकल्पिक ऊर्जा बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की मांग की। उन्होंने पंजाब की नहरों पर छोटी जलविद्युत परियोजनाएं विकसित करने का सुझाव दिया, ताकि आसपास के गांवों को सस्ती और स्वच्छ बिजली मिल सके।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञ डॉ. क्रिस्टोफ नेडोपिल वांग ने कहा कि कोयला संयंत्रों को बंद करने के लिए वित्तपोषण तय करते समय उनकी संपत्तियों का मूल्यांकन भविष्य की वास्तविक बिजली मांग के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल अनुबंधों में तय अपेक्षाओं के आधार पर मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए।

प्राइवेट पावर एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर बोर्ड के अली नवाज लेघारी ने कहा कि कोयला संयंत्र बिजली की भारी कमी दूर करने के लिए लगाए गए थे। उनके अनुसार, आयातित कोयले के लिए बनाए गए संयंत्रों को घरेलू थार कोयले से चलाने योग्य बनाने पर ईंधन आयात घट सकता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है। उन्होंने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा और बैटरी भंडारण के विस्तार के साथ भरोसेमंद बिजली उत्पादन भी जरूरी है।

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