अधिक उत्सर्जन वाले परिदृश्यों में पाकिस्तान की गेहूं, धान, मक्का और कपास की पैदावार घट सकती है: विशेषज्ञ

अधिक उत्सर्जन वाले परिदृश्यों में पाकिस्तान की गेहूं, धान, मक्का और कपास की पैदावार घट सकती है: विशेषज्ञ

इस्लामाबाद (नज़राना टाइम्स): भविष्य में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ऊंचा रहने पर पाकिस्तान में कपास, मक्का, धान और गेहूं की पैदावार में बड़ी गिरावट आ सकती है। 29वें सतत विकास सम्मेलन में विशेषज्ञों ने यह आशंका जताते हुए बदलती जलवायु के अनुकूल खेती, मजबूत अनुकूलन उपायों और सबसे अधिक जोखिम झेल रहे समुदायों की सुरक्षा के लिए नीतियां बनाने पर जोर दिया।

सम्मेलन के दूसरे दिन “पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और समानता के नजरिए से विकास पर पुनर्विचार” विषय पर सत्र आयोजित किया गया। सतत विकास नीति संस्थान (एसडीपीआई) ने अल्लामा इकबाल ओपन यूनिवर्सिटी में आयोजित इस सत्र में शोधकर्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया।

स्थानीय इथेनॉल से आयातित ईंधन पर निर्भरता घटाने का सुझाव

लाहौर की यूनिवर्सिटी ऑफ वेटरिनरी एंड एनिमल साइंसेज के डॉ. मुहम्मद अरशद विर्क ने कहा कि स्थानीय स्तर पर तैयार इथेनॉल से पाकिस्तान में ईंधन के विकल्प बढ़ सकते हैं और आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता घट सकती है। उनके अनुसार, देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कुल खपत का करीब 80 प्रतिशत परिवहन क्षेत्र में होता है। उन्होंने इस क्षेत्र को लाहौर जैसे शहरों में वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण बताया।

विर्क ने कहा कि इथेनॉल का उपयोग बढ़ाने से विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। इससे वाहनों का उत्सर्जन और हवा में मौजूद प्रदूषक कण कम हो सकते हैं, जिससे वायु प्रदूषण से जुड़े स्वास्थ्य खर्च घटाने में भी मदद मिल सकती है। उनके मुताबिक, पाकिस्तान की मौजूदा नीति में ईंधन में इथेनॉल मिलाना काफी हद तक स्वैच्छिक है, जिससे उद्योग की संभावनाएं सीमित हैं।

उन्होंने घरेलू खपत बढ़ाने और निवेशकों का भरोसा मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक नीति की मांग की, ताकि गन्ना किसानों, खेत मजदूरों और ग्रामीण समुदायों को भी इसका लाभ मिल सके।

जलवायु वित्त के वादों और जमीनी काम के बीच अंतर

रावलपिंडी की फातिमा जिन्ना महिला विश्वविद्यालय के अहमद हसन अवान ने कहा कि पाकिस्तान की विकास नीतियों में पर्यावरण को अधिक महत्व मिल रहा है, लेकिन इन नीतियों के अमल से अभी पर्याप्त पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि यह देखना जरूरी है कि जलवायु संबंधी जोखिम कौन झेलता है, अनुकूलन उपायों का लाभ किसे मिलता है और प्रभावित समुदायों की फैसलों में कितनी भागीदारी है।

अवान के अनुसार, राष्ट्रीय नीतियों में जलवायु वित्त, ऊर्जा बदलाव, बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और प्रकृति पर आधारित उपायों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। हालांकि, पर्यावरण संरक्षण को अक्सर तभी प्राथमिकता मिलती है, जब उसके आर्थिक लाभ या लोगों को होने वाले फायदे दिखाए जा सकें।

कॉमसैट्स यूनिवर्सिटी इस्लामाबाद की बुशरा याकूब ने जलवायु वित्त के वादों और जोखिम वाले समुदायों तक आपदाओं का सामना करने में सक्षम बुनियादी ढांचा पहुंचाने के बीच अंतर पर चर्चा की। उनके शोध के अनुसार, बाढ़, अत्यधिक बारिश, लू और पानी की कमी ने बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक संस्थानों, वित्तीय योजना और आपदा की तैयारी की कमजोरियां उजागर की हैं। उन्होंने बुनियादी ढांचे की योजना बनाते समय आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक समानता के पहलुओं पर एक साथ विचार करने की अपील की।

यूरोपीय कार्बन नियमों के लिए छोटे निर्यातकों को मदद की जरूरत

चीन की वुहान यूनिवर्सिटी के फयाज़ हसन ने यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) पर अपना अध्ययन पेश किया। उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था का असर पाकिस्तानी निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा, यूरोपीय बाजार तक उनकी पहुंच और नियमों के पालन की लागत के बंटवारे पर पड़ सकता है।

आठ अंकों वाले उत्पाद कोड के स्तर पर यूरोस्टैट के व्यापार आंकड़ों का हवाला देते हुए हसन ने कहा कि इस तंत्र के दायरे में आने वाले उत्पादों का पाकिस्तान से यूरोपीय संघ को निर्यात 2017 में 54.6 लाख यूरो से बढ़कर 2025 में 5 करोड़ 8.7 लाख यूरो हो गया। विकासशील देशों के आपूर्तिकर्ताओं में पाकिस्तान 45वें से 33वें स्थान पर पहुंच गया।

उन्होंने उत्सर्जन के आंकड़ों के सत्यापन की घरेलू क्षमता बढ़ाने और छोटे निर्यातकों को तकनीकी मदद देने की मांग की, ताकि नए नियमों के पालन की लागत उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों से बाहर न कर दे।

छोटे किसानों के लिए ऑफलाइन मौसम मार्गदर्शिका का प्रस्ताव

कैडेट कॉलेज हसन अब्दाल के मुहम्मद अब्दुल्ला खान ने कहा कि पाकिस्तान में मौसम बुलेटिन, पूर्वानुमान और सलाह उपलब्ध हैं, लेकिन कई छोटे किसानों को तकनीकी जानकारी के आधार पर बुवाई, सिंचाई और फसल की सुरक्षा के फैसले समय पर लेने में कठिनाई होती है।

उन्होंने एक कम लागत वाली मौसम और फसल मार्गदर्शिका का प्रस्ताव रखा, जिसका उपयोग इंटरनेट के बिना किया जा सके। इसमें चित्रों और स्थानीय भाषाओं में निर्देशों की मदद से किसानों को पूर्वानुमान समझने और उसके अनुसार कदम उठाने में सहायता मिलेगी।

सौर ऊर्जा के विस्तार के बीच ग्रिड का खर्च कौन उठाएगा?

बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञ सैयद इफ्तिखार अली ने कहा कि पाकिस्तान में नेट मीटरिंग के तहत स्थापित क्षमता 2.8 गीगावाट से बढ़कर 7.3 गीगावाट हो गई है। उनके अनुसार, बिजली की ऊंची दरों और ग्रिड आपूर्ति की विश्वसनीयता को लेकर चिंताओं ने घरों, कारोबारों और उद्योगों को सौर ऊर्जा अपनाने के लिए प्रेरित किया है।

अली ने कहा कि ग्रिड से बिजली की खरीद घटने पर भी वितरण नेटवर्क और उत्पादन क्षमता से जुड़े खर्च अपने आप कम नहीं होते। उन्होंने चेताया कि यदि इन खर्चों की वसूली मुख्य रूप से खपत के आधार पर की गई, तो ग्रिड पर निर्भर उपभोक्ताओं का बोझ बढ़ सकता है। इनमें कम आय वाले परिवार, किरायेदार और फ्लैटों में रहने वाले लोग शामिल हैं, जिनके पास सौर पैनल लगाने के सीमित विकल्प हैं।

लू और सूखे से छोटे किसानों और कामगारों को अधिक खतरा

एसडीपीआई की शोधकर्ता आमना उरूज ने कहा कि लू और सूखे का अध्ययन एक साथ किया जाना चाहिए, क्योंकि इनके प्रभाव आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक असमानता से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि दक्षिणी पंजाब तथा सिंध और बलूचिस्तान के शुष्क क्षेत्रों में छोटे किसान विशेष रूप से जोखिम में हैं। इन किसानों की बीमा, मौसम की जानकारी और वित्तीय सुरक्षा तक पहुंच सीमित है।

उरूज ने अनौपचारिक बस्तियों के निवासियों, खुले में काम करने वाले श्रमिकों और घर से काम करने वाली महिलाओं के जोखिमों की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके मुताबिक, इन समूहों को अक्सर भरोसेमंद बिजली, पानी, हवा की आवाजाही और ठंडक की पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलतीं।

सत्र में एसज़ैबिस्ट इस्लामाबाद की डॉ. शुमाइला ज़ेब और कायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी, इस्लामाबाद की डॉ. समरीन फहीम बाबर ने भी अपने विचार रखे।

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