भगवान श्री जगन्नाथ की सातवीं संध्या फेरी टैगोर नगर में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ सम्पन्न
- धार्मिक/राजनीती
- 08 Jun, 2026 05:43 AM (Asia/Kolkata)
कपूरथला। 8 जून गौरव मढिया
भगवान श्री जगन्नाथ रथयात्रा 2026, जो कि 19 जुलाई को सनातन धर्म सभा से इस्कॉन मंदिर के भक्तों एवं समस्त शहरवासियों के सहयोग से भव्य रूप में निकाली जाएगी, उसके उपलक्ष्य में आयोजित 45 दिवसीय घर-घर श्री जगन्नाथ संध्या फेरी अभियान के अंतर्गत सातवी संध्या फेरी टैगोर नगर में अत्यंत हर्षोल्लास, भक्ति एवं श्रद्धा के साथ सम्पन्न हुई।

समस्त मोहल्लावासियों ने भगवान श्री जगन्नाथ, बलदेव एवं सुभद्रा महारानी का पुष्पवर्षा, आरती एवं भोग अर्पण कर भावपूर्ण स्वागत एवं अभिनंदन किया। दिव्य हरिनाम संकीर्तन के मध्य श्रद्धालुओं ने नृत्य एवं कीर्तन का आनंद प्राप्त किया तथा भगवान की असीम कृपा के पात्र बने।
टैगोर नगर में श्री अलंग पतिवार के निवास स्थान से भगवान की संध्या फेरी का शुभारंभ हुआ, जहाँ प्रथम आरती का सौभाग्य उनके परिवार को प्राप्त हुआ। इसके उपरांत भगवान श्री जगन्नाथ ने घर-घर जाकर अपने पतित-पावन दर्शन प्रदान किए। संध्या फेरी के समापन पर अग्रवाल परिवार को भगवान की महाआरती का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर सुंदर कीर्तन, प्रेरणादायक कथा तथा भक्तिमय नृत्य का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और भगवान के प्रति अपना प्रेम एवं समर्पण व्यक्त किया।
इस अवसर पर इस्कॉन मंदिर के संचालक नकुल प्रभु जी (नीरज अग्रवाल) ने बताया कि असंख्य भक्तों के सहयोग से यह दिव्य अभियान निरंतर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि भक्तजन सर्दी, गर्मी, धूप तथा टूटी-फूटी सड़कों की परवाह किए बिना नंगे पैर भगवान की पालकी के साथ घर-घर जाकर सनातन धर्म का प्रचार कर रहे हैं। उनकी सेवा, उत्साह एवं समर्पण को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं वैकुण्ठ के विष्णुदूत भगवान की दिव्य पालकी को लेकर नगर की गलियों में विचरण कर रहे हों। भक्तों के मधुर हरिनाम संकीर्तन से कपूरथला की गलियाँ वृन्दावन धाम का अनुभव करा रही हैं।

कथा के दौरान नकुल प्रभु जी ने गोस्वामी तुलसीदास जी एवं भगवान जगन्नाथ के दिव्य प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि भगवान एक ही हैं, जो विभिन्न युगों में विभिन्न स्वरूपों में अपनी कृपा बरसाने के लिए अवतरित होते हैं। उन्होंने बताया कि जब गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीराम के दर्शन की अभिलाषा लेकर जगन्नाथपुरी पहुँचे तो प्रारम्भ में वे भगवान जगन्नाथ के स्वरूप को समझ नहीं पाए। तब भगवान ने उन्हें स्मरण कराया कि जिस दिव्य स्वरूप का वर्णन उन्होंने स्वयं रामचरितमानस में किया है, वही स्वरूप आज उनके समक्ष श्री जगन्नाथ के रूप में विराजमान है।
उन्होंने रामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई का उल्लेख करते हुए कहा—
"बिनु पद चलइ, सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥"
प्रभु जी ने बताया कि जो भगवान बिना पैरों के चल सकते हैं, बिना कानों के सुन सकते हैं, बिना हाथों के समस्त कार्य कर सकते हैं तथा बिना मुख के भी भक्तों से प्रेमपूर्ण संवाद कर सकते हैं, उन्हीं सर्वशक्तिमान प्रभु का स्वरूप भगवान जगन्नाथ के रूप में हमारे समक्ष प्रकट है। तब तुलसीदास जी को अनुभूति हुई कि श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं श्रीजगन्नाथ एक ही परम सत्य भगवान के विभिन्न दिव्य स्वरूप हैं।

प्रभु जी ने आगे कहा कि कलियुग में भगवान जगन्नाथ का स्वरूप विशेष रूप से समस्त बद्ध जीवों के उद्धार के लिए प्रकट हुआ है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को भगवान जगन्नाथ की शरण ग्रहण कर प्रेमभक्ति करनी चाहिए तथा रथयात्रा में सम्मिलित होकर भगवान के रथ की रस्सी खींचने का सौभाग्य अवश्य प्राप्त करना चाहिए। इससे मनुष्य का जीवन सफल होता है और भगवद्धाम लौटने का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि भक्तों की यह तपस्या ही है कि वे अपना तन, मन, बुद्धि और जीवन भगवान की सेवा में निष्काम भाव से समर्पित कर रहे हैं। यही भक्ति का वास्तविक स्वरूप है और यही मानव जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है।
अंत में नकुल प्रभु जी ने सभी श्रद्धालुओं को भगवान श्री जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव में सपरिवार सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया तथा भगवान श्री जगन्नाथ के कपूरथला आगमन की मंगलमयी शुभकामनाएँ प्रदान कीं।
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