Pakistan-सुप्रीम कोर्ट ने ईमान मज़ारी और हादी अली चट्ठा की 17 साल की सज़ा निलंबित की, जमानत मंजूर
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- (Asia/Kolkata)
इस्लामाबाद हाई कोर्ट में अपीलों पर फैसला होने तक राहत रहेगी जारी
इस्लामाबाद (नज़राना टाइम्स) — पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को वकील एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता ईमान ज़ैनब मज़ारी-हाज़िर और उनके पति एडवोकेट हादी अली चट्ठा को बड़ी राहत देते हुए उनकी 17-17 साल की जेल की सज़ा निलंबित कर दी और जमानत मंजूर कर ली।
जस्टिस नईम अख्तर अफगान और जस्टिस इश्तियाक इब्राहिम की दो सदस्यीय पीठ ने दोनों को दो-दो लाख रुपये के जमानती मुचलकों पर रिहा करने का आदेश दिया। यह राहत इस्लामाबाद हाई कोर्ट (IHC) में उनकी लंबित अपीलों पर फैसला होने तक प्रभावी रहेगी।
क्या है मामला?
यह मामला नेशनल साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NCCIA) द्वारा इलेक्ट्रॉनिक अपराधों की रोकथाम से संबंधित कानून, प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (PECA), की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मामले से जुड़ा है।
अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि दंपति से संबंधित सोशल मीडिया सामग्री के जरिए ऐसे विचार प्रसारित किए गए जिन्हें अधिकारियों ने “राज्य-विरोधी नैरेटिव” करार दिया। अभियोजन का यह भी आरोप था कि सामग्री के जरिए भाषाई आधार पर विभाजन पैदा करने का प्रयास किया गया। बचाव पक्ष ने इन आरोपों को चुनौती दी है।
निचली अदालत ने सुनाई थी 17 साल की सज़ा
इस्लामाबाद की जिला एवं सत्र अदालत ने जनवरी में ईमान मज़ारी और हादी अली चट्ठा को सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े विभिन्न आरोपों में कुल 17-17 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई थी।
इसमें PECA की धारा 9 के तहत पांच साल, धारा 10 के तहत 10 साल और धारा 26-A के तहत दो साल की सज़ा शामिल थी। अदालत ने उन पर अलग-अलग मामलों में भारी जुर्माना भी लगाया था।
हालांकि, धारा 11 के तहत नफरत फैलाने वाले भाषण से संबंधित आरोप में पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण दोनों को बरी कर दिया गया था।
इसके बाद मज़ारी और चट्ठा ने अपनी दोषसिद्धि और सज़ा को इस्लामाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी और अपीलों पर फैसला होने तक सज़ा निलंबित करने की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट ने देरी पर उठाए सवाल
गुरुवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा निलंबित करने संबंधी अर्जियों पर फैसला होने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 12 मई को इस्लामाबाद हाई कोर्ट को इन अर्जियों पर दो सप्ताह के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद मामला लंबित रहा।
इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने 8 सितंबर को अर्जियों की सुनवाई तय की थी, लेकिन मामले के गुण-दोष पर सुनवाई किए बिना कार्यवाही फिर स्थगित हो गई।
याचिकाकर्ताओं के वकील फैसल सिद्दीकी ने हाई कोर्ट की विभिन्न सुनवाइयों की ऑर्डर शीट पीठ के सामने पेश करते हुए बताया कि मामले की सुनवाई बार-बार स्थगित होती रही।
दूसरी ओर, एडिशनल अटॉर्नी जनरल राणा असद ने जमानत अर्जियों का विरोध करते हुए दलील दी कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 426 के तहत सज़ा निलंबित करने के मामले की सुनवाई के लिए इस्लामाबाद हाई कोर्ट उचित मंच है।
अदालत की गरिमा बनाए रखने की हिदायत
सुनवाई के दौरान जस्टिस नईम अख्तर अफगान ने यह भी कहा कि ईमान मज़ारी और हादी अली चट्ठा स्वयं कानूनी पेशे से जुड़े हैं, इसलिए उनसे अदालत की गरिमा और अनुशासन बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की जमानत मंजूर करते हुए उनकी सज़ाएं निलंबित कर दीं।
इस आदेश के बाद ईमान मज़ारी और हादी अली चट्ठा इस्लामाबाद हाई कोर्ट में अपनी अपीलों पर फैसला होने तक जेल से बाहर रह सकेंगे। मामले के मूल आरोपों और दोषसिद्धि पर अंतिम निर्णय अभी अपीलीय न्यायिक प्रक्रिया के तहत होना बाकी है।
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